January 10, 2014

आवारा शेर (किश्त २)

आवारगी पसंद शेरों की दूसरी किश्त पेश है...पहला शेर नए समाजवाद का अक्स है... धुँधली उम्मीद|

लोक-संस्कृति के दायरे में शबाब आ गया
यूँ लोहिया के मुल्क में समाजवाद आ गया|

किसी को सोने नहीं देता सर्द रात का सन्नाटा
कहीं नशे की बदहवासी में रात ढलती है|

वो शज़र और थे जो आँधी में ढह गए
हमने तो झुकने का हुनर सीखा है|

किताबी शक्ल में छपते हैं अखबार देखिये
रिश्तों की नीलामी के इश्तहार देखिये|

जैसी भी है जिंदगी खुदा तेरी रज़ा मानेंगे
अपनों के वास्ते जीने की सजा मांगेगे|

मैं हूँ जो जुलूसों में चला जा रहा हूँ,
मैं ही हूँ जो दंगों में जला जा रहा हूँ,
अपने घर जला सियासत की रोटियां सेंकी हैं,
फिर भी हर कदम पर छला जा रहा हूँ|

December 12, 2013

ये जनादेश कुछ कहता है...

जब 8 दिसम्बर को 4 राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आये तो मीडिया में चल रहे सरकार के सेमीफ़ाइनल को करार आया| नतीजे जहाँ कांग्रेस की अकड़ तोड़ने वाले थे वहीँ भाजपा के दीर्घकालिक एजेंडे को बल देने वाले| ‘आप’ पार्टी का जश्न भी इस बात का गवाह था कि उनके हाथ कुछ बड़ा लगा है| सपा-बसपा की जनाधार बढ़ाने की कोशिशों को आघात लगा है मगर 9 दिसम्बर को मिजोरम फिर कांग्रेस के हाथ लगा है| ज्यादा वोटिंग को सरकार के खिलाफ लहर का संकेत मानने वाले विश्लेषकों को भी निराशा हाथ लगी है|

दिल्ली में ‘आप’ सहित कई जानकार भी ये मान रहे हैं कि ये चुनाव अभूतपूर्व थे| चुनावों में आम आदमी पार्टी की अप्रत्याशित सफलता इस बात का सबूत है कि राजनीति में एक नया एजेंडा साकार हो गया है जिसने ना सिर्फ 15 साल से सत्ता भोग रही कांग्रेस को हाशिये पर ला दिया है बल्कि भाजपा को भी सत्ता से दूर कर दिया है| दिल्ली में उभरे त्रिशंकु समीकरण के बीच ‘आप’ और भाजपा दोनों ने ही सरकार बनाने से इनकार कर दिया है| अगर दिल्ली में दोबारा चुनाव होते हैं तो किस दल को स्पष्ट बहुमत मिलेगा अथवा मिलेगा भी या नहीं – इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है, क्यूंकि जिस बदलाव के बीच आम आदमी पार्टी ने 28 सीटें पाई हैं, भाजपा ने भी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में 32 सीटें जीती हैं| दोबारा यदि चुनाव होते भी हैं तो उनमे 4-6 महीनों का समय रहेगा और तब तक समीकरण ऐसे ही बने रहेंगे ये सोचना मूर्खता होगी| इतिहास साक्षी है कांग्रेस ने कई दफे अपनी तिकड़म या कुशलता के बूते फर्श से अर्श पर वापसी की है| इन 6 महीनों में भी अगर कांग्रेस अपना संगठन फिर व्यवस्थित करने में कामयाब होती है तो कईयों के समीकरण को पलीता लग सकता है|

मध्य प्रदेश के नतीजे अपेक्षा के अनुरूप ही थे मगर इतनी सीटें मिलने का अनुमान कईयों को नहीं था| कई वरिष्ठ पत्रकार इस विराट जीत का श्रेय कांग्रेस की आतंरिक कलह और नेताओं में आपसी सामंजस्य के आभाव को दे रहे हैं| उनकी एक स्वर-एक राग में आई प्रतिक्रिया इस बात की तस्दीक करती है कि आज की पत्रकारिता धरातल से दूर हो चली है| इसमें कोई दो राय नहीं है कि मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है मगर उस भ्रष्टाचार से लड़ने के लिये शिवराज सिंह की व्यकिगत प्रतिबद्धता भी प्रदेश में जाहिर थी| प्रदेश में लोग आज भी दिग्विजय सिंह के कुशासन को नहीं भूले हैं और जब वो उस काल की तुलना आज से करते हैं तो शिवराज सिंह को बेहतर पाते हैं| यही कारण है कि वहाँ का मतदाता कांग्रेस को वोट देने से बचता है और इसका फायदा भी शिवराज सरकार को इस अप्रत्याशित सफलता के रूप में मिला है| इन चुनावों में जीत शिवराज सिंह के नाम पर आई है इसलिए आगामी कार्यकाल शिवराज और मध्य प्रदेश दोनों के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण होगा| जनता ने उन्हें एक प्रभावी और अत्यंत सुविधाजनक जनादेश दिया है इसलिए वह ये भी देखना चाहेगी कि शिवराज भ्रष्टाचार के मुद्दे- चाहे सरकारी महकमे में हों या अपने ही मंत्रियों पर अनियमितता के आरोप, को कैसे हल करते हैं!

छत्तीसगढ़ में भले ही भाजपा और रमन सिंह तीसरी बार सरकार बनाने में कामयाब हो गए हों पर वहाँ का जनादेश एक चिंता का विषय हैं| कई सीटों पर जहाँ जीत का अंतर बहुत मामूली था वही भाजपा और कांग्रेस के मत प्रतिशत लगभग बराबर हैं| वहाँ की खाद्य सुरक्षा योजना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने सरकार बचाने में अहम भूमिका अदा की| रमन सिंह की व्यतिगत छवि तो उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाती है पर उनके करीबियों का भ्रष्टाचार चरम पर होने से जनमानस में असंतोष का विषय भी है| और इसलिए मेरी समझ में छत्तीसगढ़ का जनादेश भाजपा के लिये हर्ष से ज्यादा चिंता का संकेत है|

राजस्थान में भाजपा की जीत तो तय थी मगर कांग्रेस यूँ बे-आबरू होकर सत्ता से बेदखल होगी इसकी उम्मीद खुद वसुंधरा ने नहीं की होगी| सस्ता खाना और मुफ्त दवा भी कांग्रेस को रेगिस्तान में वनवास से नहीं बचा पायी| वहाँ की जनता ने वसुंधरा राजे को जिताकर वक्त पर दाँव खेला है| ये दाँव रंग लाता है या वसुंधरा फिर कांग्रेस को मौका देती हैं ये 2018 के चुनावों में स्पष्ट होगा|

8 दिसम्बर से गलियारों में चर्चा गर्म है कि राजनीति में बदलाव की नयी धारा का उद्गम हो गया है| लेकिन मुझे लगता है कि अभी कोई निष्कर्ष ट्रेलर पर फिल्म का रिव्यू लिखने से ज्यादा कुछ नहीं होगा| कहने को 1977 और 1989 में भी जनता जागी थी परन्तु उस जगहर की मियाद कितनी थी सब जानते हैं| जो आज जागा है कल सोएगा भी – ये एक व्यावहारिक सत्य है| सोना-जागना; जागना-सोना सहज प्रक्रिया के अंग हैं| हाँ, एक राजनीतिक विकल्प जरूर मिला है पर देश में पहले भी 1100 विकल्प आकार ले चुके हैं और सभी जन्म के वक्त बदलाव और सुचिता के ही वाहक थे| जेपी- लोहिया के आन्दोलन से जन्मे समाजवादी नेता आगे चलकर देश में भ्रष्टाचार की मिसाल बन गए| इतिहास गवाह है कि हर नदी मुहाने तक नहीं पहुँचती और आम आदमी पार्टी ने तो किसी दूसरी नदी से ना मिलने की कसम खायी है| ऐसे में अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा ये तो वक्त ही बताएगा मगर आशा है जो भी होगा शुभ होगा- देश के लिये| इस बीच आत्ममंथन की कवायद भी जारी है|

November 04, 2013

लोकतंत्र - दिवाली से दिवाले तक

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव| आपने भी सुना होगा - अरे सफेदपोश आए दिन गाते रहते हैं और गाना भी चाहिए| वरना बॉलीवुड में कितनी बड़ी जमात है जो खाती तो हिंदी का है पर गाती अंग्रेजी का है| इसी लोकतंत्र में एक और उत्सव आकर चला गया - दिवाली| महंगाई कितनी भी रही हो पर लोगों का उत्साह देखते ही बनता था, रात भर में करोड़ों रुपये धुँआ कर दिए| कोहरे की चादर में दुबकी सुबह - पटाखों की लाशें गवाह थे कि किस हद तक रात लोग खुशी में चूर थे!

जब उत्साह अपने चरम पर था तो मनहूसियत की भी कोई कमी नहीं थी| कहीं अगर रंग-बिरंगी झालरें अमावस से आँख-मिचौली खेल रही थी कुछ घर कल भी रौशन नहीं हो सके| किसी की जेब धोखा दे गयी तो किसी के घर दंगाइयों के करम| कहने को तो कार्तिक आ गया पर उनकी आखों में सावन अब भी हरा है|

अब सवाल ये है उन्हें किसने रोका था? लोकतंत्र है जिसके जो जी में आये वो कर सकते है, वो भी फूँक लेते कुछ| और फिर उत्सव का तो लोकतंत्र में बड़ा स्थान है| झालर, चमक-धमक, पटाखे, अँधेरा या फिर दंगे - इन सबके मूल में लोकतंत्र ही है| काशीनाथ सिंह लोकतंत्र पर 'अपना मोर्चा' में कुछ यूँ लिखते हैं- 

"एक आदमी जी-तोड़ मेहनत करता है फिर भी गरीब ही क्यों रहता है? जब खाने को इतना मौजूद है तो लोग भूखों क्यों मरते हैं? जब सारा शहर रंग-बिरंगे कपड़ों से भरा पड़ा है तो लोग नंगे क्यों हैं? जब इतना ज्ञान - इतनी किताबें हैं तो लोग जाहिल और मूर्ख क्यों हैं? जिसे सुख कहते हैं, वह क्या चीज है? यह कानून - संविधान किसने बनाया है?
यह संविधान कहता है कि तुम जो चाहो, खा सकते हो; जो चाहो, बोल सकते हो; जैसे चाहो रह सकते हो ! लेकिन हमें इनमे से कुछ भी करने कि छूट क्यूँ नहीं है? हम देख रहे हैं कि सामने फलों और मिठाइयों कि एक सजी दुकान है, हम भूखे हैं तो क्या; अगर हमारे पास पैसे नहीं हैं तो मौज करें| भूखों मरें| हमे छूट है कि हम जो चाहे बोलें लेकिन हमारी आँखों के आगे हमारा घर लुट रहा है; लेकिन बोल नहीं सकते|"

प्रसिद्ध व्यंग्यकार संपत सरल के मुताबिक "हज़ार करोड़ का IPL उसी देश में खेला जाता है जहाँ करोड़ों BPL बसते हैं|" हमारी प्राथमिकताएँ एक-दूसरे से इतनी अलग हो गयी हैं कि दो सामानांतर हिन्दुस्तान साफ़ नज़र आने लगे हैं| एक आज भी अपनी रोजी-रोटी की जद्दोजहद में उलझा है तो दूसरा अपने ही नशे में धुत है| सवाल दिवाली, ईद या क्रिकेट का नहीं है, सवाल उस विरोधाभास का जो हर कदम हमारे साथ चल रहा है और हम उसे नज़रंदाज़ करते ही जा रहे हैं| मुझे किसी के दिवाली मनाने से कोई ऐतराज़ नहीं पर किसी को ये भी ना लगे कि ये दिवाली नहीं ये उसके दिवाले का जश्न है!

October 20, 2013

आवारा शेर (किश्त १)

ये मेरे कुछ वो शेर हैं जिन्हें पूरी ग़ज़ल नसीब नहीं हुई | हालाँकि गुनाह मेरा है पर आवारगी का इल्जाम इन शेरों के सर आया है....

ये शहर बड़े अन्जान होते हैं |
लोग  पत्थरों के सिर्फ काँच के मकान होते हैं |

आज ज्यादा मिल गया कल भूखे सो गए|
ऐसे ही जिंदगी को कई रोज़ हो गए |

वो तेरा ये मेरा कोई हद सी लगती है |
कमरों की दीवारें सरहद जैसी लगतीहै |

वक्त ने सबका हिसाब लिक्खा है |
किसी के हिस्से काँटे किसी के गुलाब लिक्खा है|

कितने राज़ सीने में दफ्न किये जल रहा हूँ मैं
सुबह की उम्मीद में हर शाम ढाल रहा हूँ मैं
यूँ तो ठोकरें खाना पुराना शौक रहा है मगर
सँभालने की कोशिश में रिवाज़ बदल रहा हूँ मैं |

जिस्म का आशियाँ अब भी वही मोहल्ला है |
ज़रा सी बात पे बिफरीं खुशियों ने पता बदला है|

March 05, 2013

सरकार ने सड़कों का जो बिछाया जाल यही है


सरकार ने सड़कों का जो बिछाया जाल यही है|
फोरलेनी फाइलों में दौड़ता सरपट कमाल यही है||

दंगों में कल कुछ औरतों के लूट लिये शौहर|
फिर नामे विधवा पेंशन दिया माल यही है||

अरसा हुआ सूबे में जब दबंगों का राज था|
हुक्मरां जब उतरे गुंडई में वो साल यही है||

कहते है कुछ खादी तो कुछ गाँधी कोई ड्रामा|
बचने को कानूनी नज़र से सफ़ेद ढाल यही है||

क्या ठोकरें ही हैं मेरी जिंदगी का फलसफा|
हर दर पे हूँ जो पूंछता वो सवाल यही है||


February 21, 2013

लो आ गए बजट वाले...


सुना है फिर बजट आ रहा है| साल दर साल संसद में बजट जा रहा है आ रहा है, वित्त मंत्री का पिटारा खुलता जा रहा है राजनीति की चासनी में घुलता जा रहा है| कितने वित्त मंत्री आये गए पर ये बजट संसद में अपनी हाजरी हर वर्ष दर्ज करा रहा है| आमतौर पर वर्ष के फ़रवरी माह में आने वाला बजट अपने आप में आग का गोला होता है शायद यही कारण है कि इस बजट के पारित होते ही मौसम में कुछ गर्मी कि दस्तक महसूस होने लगती है| बजट के आने की सुगबुगाहट होते ही शेयर बाज़ार के दलाल अपनी कमाई के जुगाड़ में लग जाते हैं| 15 दिन पहले से बाज़ारों के उतार-चढ़ाव का खेल चालू हो जाता है, प्रतीत होता है अगले वित्त वर्ष का बजट पिछले साल की कमाई पर भी हाथ साफ़ कर देगा|

यकीन मानिये जब बजट संसद में पढ़ा जाता है तो यूँ लगता है मानो स्वयं भगवान ब्रम्हा तकदीर का लिखा पढकर सुना रहे हों| हर योजना बरसाती इन्द्रधनुष लगती है जो देखने में बेहद आकर्षक नजर आती है पर यथार्थ से उतनी ही परे होती है| सत्ता के गलियारों में उछल-कूद करने वाले सरकार के इस लुभावने स्टंट को भलीभाँति समझते हैं, पर जो टीवी अखबार से चिपकी जनता है उसे हर बजट में उम्मीद ही नजर आती है| उसे राजनीति का ये अखाड़ा अपने जैसा ही मासूम नजर आता है जहाँ वोट के बदले सुनहरे कल की उम्मीद परोसी जाती है और उसे वो सच मान बैठता है|

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि कितने काबिल होते हैं ये वित्त-मंत्री – १२० करोड़ आबादी वाली जनता की जरूरतों को ये दिल्ली के एक बंद ए.सी. कमरे में बैठकर ही समझ लेते हैं| और उससे भी अद्भुत होता है वो दृश्य जब आदरणीय वित्त-मंत्री ३६५ दिन के बहीखाते और योजनाओं को दिनभर के कुछ घंटों में पढ़ देते हैं| हज़ार-लाख करोड़ के आँकड़े सुनकर तो मन में मोर नाचने लगते हैं मगर साल बीतते-बीतते, अंत तक न वो नृत्य बचता है न मोर|

भारत बदल रहा है| लोग बदल रहे हैं| बच्चों ने अपने खिलौने बदल दिए हैं, युवा पश्चिम की ओर चल दिए हैं, महिलाओं ने परिधानों का बोझ कम किया है बड़ों ने सुबह-शाम व्हिस्की-रम पिया है| अब तुम भी बदल डालो ये रिवाज़ जो जनता के साथ सरेआम धोखा है| अरे आप लोग साल-भर तो घर के बजट में आग लगते हैं और साल के अंत में ‘देश के बजट’ के नाम पर चुनावी-राग सुनाते हैं| बजट जिसे सामाजिक विषमता को कम करने की व्यवस्था होना चाहिए था वो कॉर्पोरेट हाउसेज के तुष्टीकरण का उत्सव मात्र बनकर रह गया है| अगर वाकई देश की पीड़ा का एहसास है तो इन कागजों के बाहर, आकड़ों से ऊपर कुछ कर के दिखाएँ – ये बजट वाले|

August 24, 2012

कि लो बरसे हैं बादल

कि लो बरसे हैं बादल आज जमकर यूँ दरीचे से
जहाँ तक देख सकते हैं नज़र आबाद होती है|
घरों में लोग कहते हैं अजब है लुत्फ़ बारिश का,
उन्हें मालूम क्या झुग्गी मेरी बर्बाद होती है||
(...जारी है| )