भारत विश्व का सबसे बड़ा
लोकतंत्र है और चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव| आपने भी सुना होगा - अरे सफेदपोश आए दिन गाते रहते हैं और गाना भी चाहिए| वरना बॉलीवुड में कितनी बड़ी जमात है जो खाती तो हिंदी का है पर गाती अंग्रेजी का है| इसी लोकतंत्र में एक और उत्सव आकर चला गया - दिवाली| महंगाई कितनी भी रही हो पर लोगों का उत्साह देखते ही बनता था, रात भर में करोड़ों रुपये धुँआ कर दिए| कोहरे की चादर में दुबकी सुबह - पटाखों की लाशें गवाह थे कि किस हद तक रात लोग खुशी में चूर थे!
जब उत्साह अपने चरम पर था तो मनहूसियत की भी कोई कमी नहीं थी| कहीं अगर रंग-बिरंगी झालरें अमावस से आँख-मिचौली खेल रही थी कुछ घर कल भी रौशन नहीं हो सके| किसी की जेब धोखा दे गयी तो किसी के घर दंगाइयों के करम| कहने को तो कार्तिक आ गया पर उनकी आखों में सावन अब भी हरा है|
अब सवाल ये है उन्हें किसने रोका था? लोकतंत्र है जिसके जो जी में आये वो कर सकते है, वो भी फूँक लेते कुछ| और फिर उत्सव का तो लोकतंत्र में बड़ा स्थान है| झालर, चमक-धमक, पटाखे, अँधेरा या फिर दंगे - इन सबके मूल में लोकतंत्र ही है| काशीनाथ सिंह लोकतंत्र पर 'अपना मोर्चा' में कुछ यूँ लिखते हैं-
"एक आदमी जी-तोड़ मेहनत करता
है फिर भी गरीब ही क्यों रहता है? जब खाने को इतना मौजूद है तो लोग भूखों क्यों
मरते हैं? जब सारा शहर रंग-बिरंगे कपड़ों से भरा पड़ा है तो लोग नंगे क्यों हैं? जब
इतना ज्ञान - इतनी किताबें हैं तो लोग जाहिल और मूर्ख क्यों हैं? जिसे सुख कहते
हैं, वह क्या चीज है? यह कानून - संविधान किसने बनाया है?
यह संविधान कहता है कि तुम
जो चाहो, खा सकते हो; जो चाहो, बोल सकते हो; जैसे चाहो रह सकते हो ! लेकिन हमें
इनमे से कुछ भी करने कि छूट क्यूँ नहीं है? हम देख रहे हैं कि सामने फलों और
मिठाइयों कि एक सजी दुकान है, हम भूखे हैं तो क्या; अगर हमारे पास पैसे नहीं हैं
तो मौज करें| भूखों मरें| हमे छूट है कि हम जो चाहे बोलें लेकिन हमारी आँखों के
आगे हमारा घर लुट रहा है; लेकिन बोल नहीं सकते|"
प्रसिद्ध व्यंग्यकार संपत सरल के मुताबिक "हज़ार करोड़ का IPL उसी देश में खेला जाता है जहाँ करोड़ों BPL बसते हैं|" हमारी प्राथमिकताएँ एक-दूसरे से इतनी अलग हो गयी हैं कि दो सामानांतर हिन्दुस्तान साफ़ नज़र आने लगे हैं| एक आज भी अपनी रोजी-रोटी की जद्दोजहद में उलझा है तो दूसरा अपने ही नशे में धुत है| सवाल दिवाली, ईद या क्रिकेट का नहीं है, सवाल उस विरोधाभास का जो हर कदम हमारे साथ चल रहा है और हम उसे नज़रंदाज़ करते ही जा रहे हैं| मुझे किसी के दिवाली मनाने से कोई ऐतराज़ नहीं पर किसी को ये भी ना लगे कि ये दिवाली नहीं ये उसके दिवाले का जश्न है!